| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार » श्लोक 46 |
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| | | | श्लोक 1.11.46  | नारायण, कृष्णदास आर मनोहर ।
देवानन्द - चारि भाइ निताइ - किङ्कर ॥46॥ | | | | | | | अनुवाद | | बत्तीसवें, तैंतीसवें, चौंतीसवें और पैंतीसवें प्रमुख भक्त नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानंद थे, जो सदैव भगवान नित्यानंद की सेवा में लगे रहते थे। | | | | Narayan, Krishnadas, Manohar and Devananda - these four brothers were the thirty-second, thirty-third, thirty-fourth and thirty-fifth devotees of Lord Nityananda, who were always engaged in the service of Lord Nityananda. | | ✨ ai-generated | | |
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