श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.11.4 
तस्य श्री कृष्ण - चैतन्य - सत्प्रेमामर - शाखिनः ।
ऊर्ध्व - स्कन्धावधूतेन्दोः शाखा - रूपान्गणान्नुमः ॥4॥
 
 
अनुवाद
श्री नित्यानंद प्रभु, भगवान श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के शाश्वत प्रेम रूपी अविनाशी वृक्ष की सर्वोच्च शाखा हैं। मैं उस सर्वोच्च शाखा की सभी उपशाखाओं को सादर प्रणाम करता हूँ।
 
Sri Nityananda Prabhu is the topmost branch of the immortal tree of love for God, Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu. I offer my respectful obeisances to all the sub-branches of that topmost branch.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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