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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.11.29 
परमेश्वर - दास - नित्यानन्दैक - शरण ।
कृष्ण - भक्ति पाय, ताँरे ये करे स्मरण ॥29॥
 
 
अनुवाद
परमेश्वर दास, जिन्हें कृष्ण-लीला का पाँचवाँ गोपाल कहा जाता है, नित्यानंद के चरणकमलों में पूर्णतः समर्पित थे। जो कोई भी उनके नाम, परमेश्वर दास, का स्मरण करता है, उसे कृष्ण का प्रेम सहज ही प्राप्त हो जाता है।
 
Parameshwar Das, known as the fifth Gopala of the Krishna Lila, was completely devoted to the lotus feet of Nityananda Prabhu. Anyone who remembers his name, Parameshwar Das, will easily attain love for Krishna.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाश्य में लिखा है, "चैतन्य-भागवत में कहा गया है कि परमेशवर दास, जिन्हें कभी-कभी परमेश्वरी दास के नाम से भी जाना जाता था, श्री नित्यानंद प्रभु के प्राण और आत्मा थे। परमेश्वर दास का शरीर भगवान नित्यानंद के लीला स्थल था। परमेश्वर दास, जो कुछ समय के लिए खड़दहा गाँव में रहते थे, हमेशा एक चरवाहे बालक के आनंद से भरे रहते थे। पहले वे कृष्ण और बलराम के मित्र अर्जुन थे। वे बारह गोपालों में पांचवें थे। जब श्रीमती जाह्नवी-देवी ने खेताड़ी में उत्सव मनाया तो उन्होंने उनका साथ दिया। भक्ति-रत्नाकर में कहा गया है कि श्रीमती जाह्नवी-माता के आदेश से उन्होंने हुगली जिले के आटापुर में मंदिर में राधा-गोपीनाथ की स्थापना की। आटापुर स्टेशन हावड़ा और अमता के बीच नैरोगेज रेलवे लाइन पर है। मित्र परिवार द्वारा स्थापित आटापुर में एक और मंदिर है, जिसे राधा-गोविंद मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के सामने, दो बकुला पेड़ों और एक कदंब पेड़ के बीच एक बहुत ही आकर्षक जगह में, परमेश्वरी ठाकुर का मकबरा है, और उसके ऊपर तुलसी की झाड़ी के साथ एक वेदी है। ऐसा कहा जाता है कि कदंब पेड़ से साल में केवल एक ही फूल निकलता है। इसे देवता को अर्पित किया जाता है।

"परमेश्वरी ठाकुर, ऐसा कहा जाता है, वैद्य परिवार से थे। उनके भाई के वंशज वर्तमान में मंदिर में पूजा करते हैं। उनके कुछ परिवार के सदस्य अभी भी हुगली जिले में, चंडीतला के डाकघर के पास रहते हैं। परमेश्वरी ठाकुर के वंशजों ने ब्राह्मण परिवारों से कई शिष्य ग्रहण किए, लेकिन जैसे-जैसे ये वंशज धीरे-धीरे चिकित्सकों के पेशे में चले गए, ब्राह्मण परिवारों के लोग उनके शिष्य बनना बंद हो गए। परमेश्वरी के वंशजों की पारिवारिक उपाधियाँ अधिकारी और गुप्ता हैं। दुर्भाग्य से, उनके परिवार के सदस्य सीधे देवता की पूजा नहीं करते हैं; उन्होंने देवता की पूजा के लिए वेतनभोगी ब्राह्मणों को नियुक्त किया है। मंदिर में, बलदेव और श्री श्री राधा-गोपीनाथ एक साथ सिंहासन पर विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान बलदेव की मूर्ति बाद में स्थापित की गई थी क्योंकि दिव्य भाव के अनुसार, बलदेव, कृष्ण और राधा एक ही सिंहासन पर नहीं रह सकते। वैशाख (अप्रैल-मई) के पूर्णिमा के दिन, इस मंदिर में परमेश्वरी ठाकुर के प्रकटोत्सव को मनाया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)