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अनुवाद
श्री नित्यानंद प्रभु के तेरहवें महत्वपूर्ण भक्त पंडित पुरंदर थे, जो भगवान के प्रेम के सागर में मंदार पर्वत की तरह विचरण करते थे।
The thirteenth chief devotee of Shri Nityananda Prabhu was Pandit Purandar. He walked in the ocean of love for God as if he were a mountain.
तात्पर्य
पंडित पुरंदर खड़दाहा में श्री नित्यानंद प्रभु से मिले थे। जब नित्यानंद प्रभु इस गाँव आए थे, उन्होंने बहुत ही असामान्य रूप से नृत्य किया था और उनके नृत्य ने पुरंदर पंडित को मोहित कर लिया था। पंडित एक पेड़ पर चढ़े हुए थे और जब उन्होंने नित्यानंद का नृत्य देखा, तो वह नीचे जमीन पर कूद पड़े और स्वयं को अंगद घोषित किया, जो भगवान रामचंद्र के समय हनुमान के शिविर में एक भक्त थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥