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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.11.23 
सुन्दरानन्द - नित्यानन्देर शाखा, भृत्य मर्म ।
याँर सङ्गे नित्यानन्द करे व्रज - नर्म ॥23॥
 
 
अनुवाद
श्री नित्यानंद प्रभु की एक अन्य शाखा, सुंदरानंद, भगवान नित्यानंद के सबसे अंतरंग सेवक थे। भगवान नित्यानंद प्रभु ने उनके सानिध्य में व्रजभूमि के जीवन को अनुभव किया।
 
Another branch of Sri Nityananda Prabhu, Sundarananda was his close servant. In his company, Nityanand Prabhu experienced the life of Vrajbhoomi.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "चैतन्य-भागवत, अन्त्य-खण्ड, अध्याय पाँच में कहा गया है कि सुन्दरानंद भगवद् प्रेम के सागर थे और श्री नित्यानंद प्रभु के प्रमुख सहयोगी थे। गौरा-गणोद्देश-दीपिका (127) में कहा गया है कि कृष्ण-लीला में वे सुदामा थे। इस प्रकार वे उन बारह ग्वाल-बालकों में से एक थे जो बलराम के साथ अवतरित हुए थे जब उन्होंने श्री नित्यानंद प्रभु के रूप में अवतार लिया था। सुन्दरानंद का पवित्र निवास वह गाँव है जिसे महेशापुर के नाम से जाना जाता है, जो कलकत्ता से बर्दवान तक पूर्वी रेलवे के माझदिया रेलवे स्टेशन से लगभग चौदह मील पूर्व में है। यह स्थान यशोर जिले में है, [जो अब बांग्लादेश में है]। इस गाँव के अवशेषों में से केवल सुन्दरानंद का पुराना आवासीय घर अभी भी मौजूद है। गाँव के अंत में एक बाउल [छद्म वैष्णव] रहता है, और सभी इमारतें, चाहे मंदिर हों या घर, नवनिर्मित प्रतीत होते हैं। महेशापुर में श्री राधा-वल्लभ और श्री श्री राधा-रमण की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पास वेत्रवती नाम की एक छोटी नदी है।

"सुन्दरानंद प्रभु नैष्ठिक-ब्रह्मचारी थे: उन्होंने अपने जीवन में कभी शादी नहीं की। इसलिए उनके शिष्यों को छोड़कर उनके कोई प्रत्यक्ष वंशज नहीं थे, लेकिन उनके परिवार के वंशज अभी भी बीरभूम जिले के मंगलडीही नामक गाँव में रहते हैं। उसी गाँव में बलराम का एक मंदिर है, और वहाँ की मूर्ति की नियमित रूप से पूजा की जाती है। महेशापुर की मूल मूर्ति, राधा-वल्लभ, को बेरहामपुर के सैदाबाद गोस्वामियों द्वारा ले जाया गया था, और वर्तमान मूर्तियों को स्थापित करने के बाद से, महेशापुर के एक जमींदार परिवार ने उनकी पूजा की देखभाल की है। माघ (जनवरी-फरवरी) महीने की पूर्णिमा के दिन, सुन्दरानंद की दिव्य उपस्थिति की वर्षगांठ नियमित रूप से मनाई जाती है, और पड़ोसी क्षेत्रों के लोग इस त्योहार को मनाने के लिए एकत्र होते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)