"सुन्दरानंद प्रभु नैष्ठिक-ब्रह्मचारी थे: उन्होंने अपने जीवन में कभी शादी नहीं की। इसलिए उनके शिष्यों को छोड़कर उनके कोई प्रत्यक्ष वंशज नहीं थे, लेकिन उनके परिवार के वंशज अभी भी बीरभूम जिले के मंगलडीही नामक गाँव में रहते हैं। उसी गाँव में बलराम का एक मंदिर है, और वहाँ की मूर्ति की नियमित रूप से पूजा की जाती है। महेशापुर की मूल मूर्ति, राधा-वल्लभ, को बेरहामपुर के सैदाबाद गोस्वामियों द्वारा ले जाया गया था, और वर्तमान मूर्तियों को स्थापित करने के बाद से, महेशापुर के एक जमींदार परिवार ने उनकी पूजा की देखभाल की है। माघ (जनवरी-फरवरी) महीने की पूर्णिमा के दिन, सुन्दरानंद की दिव्य उपस्थिति की वर्षगांठ नियमित रूप से मनाई जाती है, और पड़ोसी क्षेत्रों के लोग इस त्योहार को मनाने के लिए एकत्र होते हैं।"
