श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.11.2 
जय जय महाप्रभु श्री कृष्ण - चैतन्य ।
ताँहार चरणाश्रित येइ, सेइ धन्य ॥2॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! जो कोई उनके चरणकमलों की शरण में आया है, वह यशस्वी है।
 
All glory to Sri Chaitanya Mahaprabhu! Blessed is he who has taken refuge at His feet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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