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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.11.13 
श्री रामदास आर, गदाधर दास ।
चैतन्य - गोसाञि र भक्त रहे ताँर पाश ॥13॥
 
 
अनुवाद
श्री रामदास और गदाधर दास नाम के भगवान चैतन्य के दो भक्त हमेशा श्री वीरभद्र गोसांई के साथ रहते थे।
 
Sri Ramdas and Gadadhara Das, two devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu, always lived with Sri Veerbhadra Gosain.
तात्पर्य
श्री रामदास, जिन्हें बाद में अभिराम ठाकुर के नाम से जाना गया, श्री नित्यानंद प्रभु के बारह गोपालों या ग्वालों में से एक थे। गौर-गणोद्देश-दीपिका (१२६) में कहा गया है कि श्री रामदास पहले श्री दामा थे। भक्ति-रत्नाकर (चौथी लहर) में श्रील अभिराम ठाकुर का वर्णन है। श्री नित्यानंद प्रभु के आदेश से अभिराम ठाकुर एक महान आचार्य और चैतन्य धर्म की भक्ति सेवा के प्रचारक बने। वह एक बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व थे, और अधर्मी उनसे बहुत डरते थे। श्री नित्यानंद प्रभु द्वारा सशक्त, वह हमेशा परमानंद में रहते थे और सभी पतित आत्माओं के प्रति अत्यधिक दयालु थे। ऐसा कहा जाता है कि अगर वह शालग्राम-शिला के अलावा किसी भी पत्थर को नमन करते थे तो वह तुरंत टूट जाता था।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "हावड़ा से कलकत्ता से अमता तक नैरोगेज रेलवे लाइन पर चाँपाडँगा रेलवे स्टेशन के दस मील दक्षिण-पश्चिम में, श्रील अभिराम ठाकुर द्वारा पूजा किए जाने वाले मंदिर स्थित है। हुगली जिले का एक गाँव, खानकूला-कृष्णनगर नामक एक छोटा सा शहर है। बरसात के मौसम में जब इस इलाके में पानी भर जाता है, तो लोगों को दूसरी लाइन से वहां जाना पड़ता है। जिसे अब दक्षिण पूर्वी रेलवे कहा जाता है। इस लाइन पर कोलाघाटा नाम का एक स्टेशन है, जहाँ से रानीचक के लिए स्टीमर से जाना पड़ता है। रानीचक से साढ़े सात मील उत्तर में खानकूला है। अभिराम ठाकुर द्वारा पूजा किया जाने वाला मंदिर कृष्णनगर में स्थित है, जो खान (द्वारकेश्वर नदी) के कुला (किनारे) के पास है; इसलिए इस स्थान को खानकूला-कृष्णनगर के रूप में मनाया जाता है। मंदिर के बाहर बकुला का पेड़ है। इस स्थान को सिद्ध-बकुला-कुंज के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब अभिराम ठाकुर वहां आए तो वह इस पेड़ के नीचे बैठ गए। खानकूला-कृष्णनगर में हर साल वैशाख (मार्च-अप्रैल) के महीने में कृष्ण-सप्तमी पर एक बड़ा मेला लगता है, जो अमावस्या का सातवां दिन होता है। इस उत्सव के लिए कई सौ और हजारों लोग जुटते हैं। जिस मंदिर में अभिराम ठाकुर ने पूजा की थी उसका एक बहुत पुराना इतिहास है। मंदिर में विराजमान देवता को गोपीनाथ कहा जाता है। मंदिर के पास कई सेवाट परिवार रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अभिराम ठाकुर के पास एक चाबुक थी और जिस किसी को भी वह छूता था, वह तुरंत कृष्ण का एक ऊंचा भक्त बन जाता था। उनके कई शिष्यों में से श्रीमान श्रीनिवास आचार्य सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रिय थे, लेकिन संदेह है कि क्या वह उनके दीक्षित शिष्य थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)