श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "हावड़ा से कलकत्ता से अमता तक नैरोगेज रेलवे लाइन पर चाँपाडँगा रेलवे स्टेशन के दस मील दक्षिण-पश्चिम में, श्रील अभिराम ठाकुर द्वारा पूजा किए जाने वाले मंदिर स्थित है। हुगली जिले का एक गाँव, खानकूला-कृष्णनगर नामक एक छोटा सा शहर है। बरसात के मौसम में जब इस इलाके में पानी भर जाता है, तो लोगों को दूसरी लाइन से वहां जाना पड़ता है। जिसे अब दक्षिण पूर्वी रेलवे कहा जाता है। इस लाइन पर कोलाघाटा नाम का एक स्टेशन है, जहाँ से रानीचक के लिए स्टीमर से जाना पड़ता है। रानीचक से साढ़े सात मील उत्तर में खानकूला है। अभिराम ठाकुर द्वारा पूजा किया जाने वाला मंदिर कृष्णनगर में स्थित है, जो खान (द्वारकेश्वर नदी) के कुला (किनारे) के पास है; इसलिए इस स्थान को खानकूला-कृष्णनगर के रूप में मनाया जाता है। मंदिर के बाहर बकुला का पेड़ है। इस स्थान को सिद्ध-बकुला-कुंज के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब अभिराम ठाकुर वहां आए तो वह इस पेड़ के नीचे बैठ गए। खानकूला-कृष्णनगर में हर साल वैशाख (मार्च-अप्रैल) के महीने में कृष्ण-सप्तमी पर एक बड़ा मेला लगता है, जो अमावस्या का सातवां दिन होता है। इस उत्सव के लिए कई सौ और हजारों लोग जुटते हैं। जिस मंदिर में अभिराम ठाकुर ने पूजा की थी उसका एक बहुत पुराना इतिहास है। मंदिर में विराजमान देवता को गोपीनाथ कहा जाता है। मंदिर के पास कई सेवाट परिवार रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अभिराम ठाकुर के पास एक चाबुक थी और जिस किसी को भी वह छूता था, वह तुरंत कृष्ण का एक ऊंचा भक्त बन जाता था। उनके कई शिष्यों में से श्रीमान श्रीनिवास आचार्य सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रिय थे, लेकिन संदेह है कि क्या वह उनके दीक्षित शिष्य थे।
