श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.11.12 
सेइ वीरभद्र - गोसाञि र लइनु शरण ।
याँहार प्रसादे हय अभीष्ट - पूरण ॥12॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं वीरभद्र गोसानी के चरणकमलों की शरण लेता हूँ, ताकि उनकी कृपा से श्री चैतन्य-चरितामृत लिखने की मेरी महान इच्छा का उचित मार्गदर्शन हो सके।
 
Therefore, I take refuge in the lotus feet of Veerabhadra Gosain, so that I may be properly guided in my great desire of writing Sri Chaitanya Charitamrita.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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