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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.10.89 
पश्चिमेर लोक सब मूढ़ अनाचार ।
ताहाँ प्रचारिल दोंहे भक्ति - सदाचार ॥89॥
 
 
अनुवाद
भारत के पश्चिमी भाग में सामान्यतः लोग न तो बुद्धिमान थे और न ही अच्छे आचरण वाले, लेकिन श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी के प्रभाव से वे भक्ति सेवा और अच्छे आचरण में प्रशिक्षित थे।
 
The people of the western part of India were neither intelligent nor polite, but through the influence of Srila Rupa Goswami and Sanatana Goswami they were trained in devotion and good conduct.
तात्पर्य
हालाँकि यह केवल पश्चिमी भारत में ही नहीं है कि लोग मुसलमानों से संबंध बनाकर दूषित हो गये हैं, यह एक तथ्य है कि भारत में जितना पश्चिम की ओर बढ़ते जाएँगे, उतना ही अधिक लोगों को वैदिक संस्कृति से भ्रष्ट पाएँगे। पाँच हजार साल पहले तक, जब पूरा ग्रह महाराज परीक्षित के अधीन था, तब वैदिक संस्कृति सर्वत्र प्रचलित थी। हालाँकि, धीरे-धीरे, लोग गैर-वैदिक संस्कृति से प्रभावित हुए और उन्होंने भक्ति-सेवा के संबंध में व्यवहार करने का तरीका खो दिया। श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ने पश्चिमी भारत में बहुत दयालुतापूर्वक भक्ति पंथ का प्रचार किया, और उनके पदचिन्हों पर चलते हुए पश्चिमी देशों में चैतन्य पंथ के प्रचारक संकीर्तन आंदोलन का प्रसार कर रहे हैं और वैष्णव व्यवहार के सिद्धांतों को समझा रहे हैं, इस प्रकार पहले म्लेच्छों और यवनों की संस्कृति के आदी कई व्यक्तियों को शुद्ध और सुधार रहे हैं। पश्चिमी देशों में हमारे सभी भक्त अवैध यौन संबंध, नशा, मांसाहार और जुए की अपनी पुरानी आदतों को त्याग देते हैं। बेशक, पाँच सौ साल पहले भारत में ये प्रथाएँ अज्ञात थीं - कम से कम पूर्वी भारत में - लेकिन दुर्भाग्य से वर्तमान में पूरे भारत को इन गैर-वैदिक सिद्धांतों ने पीड़ित किया है, जिन्हें कभी-कभी सरकार भी समर्थन देती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)