सहजियाओं ने श्रील जीवा गोस्वामी पर तीन आरोप लगाये थे। निश्चित ही भक्ति सेवा के निष्पादन के लिये वह कदापि अनुकूल नहीं है। प्रथम आरोप एक भौतिकवादी व्यक्ति से सम्बंधित है जो संस्कृत साहित्य में अपनी प्रतिष्ठा पर अत्यंत गर्व करता था और शास्त्रों पर उनसे तर्क करने के लिए श्रीरूप और सनातन के पास आया था। श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहते थे उन्होंने उसे एक लिखित कथन दिया कि उसने शास्त्रों पर बहस में उन्हें परास्त कर दिया था। यह पत्र लेकर वह विद्वान जीवा गोस्वामी के पास भी इसी तरह की प्रमाणपत्र के लिए गया लेकिन जीवा गोस्वामी उसे देने के लिए सहमत नहीं हुए। इसके विपरीत, उन्होंने उसके साथ शास्त्रों पर बहस की और उसे पराजित कर दिया। श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को यह कहकर कि उसने उन्हें पराजित किया है यह श्री जीवा गोस्वामी का कर्तव्य था कि उस व्यक्ति को रोके। किंतु उनकी अशिक्षा के कारण सहजिया वर्ग इस घटना को श्रील जीवा गोस्वामी पर नम्रता के सिद्धांत से विचलित होने का आरोप लगाने के लिए संदर्भित करते हैं। तथापि, उन्हें नहीं पता कि नम्रता और विनम्रता तभी उचित है जब स्वयं के सम्मान का अपमान हुआ हो किंतु तब नहीं जब भगवान विष्णु या आचार्य की निंदा की गई हो। ऐसे मामलों में व्यक्ति को नम्र और विनम्र नहीं होना चाहिए बल्कि उसे कार्य करना चाहिए। श्रील चैतन्य महाप्रभु ने जो उदाहरण दिया है उसका पालन करना चाहिए। भगवान चैतन्य अपने शिक्षाष्टक (3) में कहते हैं -
तृणाद अपि सुनीचेन तरोर इव सहिष्णुना
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः
"व्यक्ति को यह सोचते हुए भगवान के पवित्र नाम का जप करना चाहिए कि वह सड़क में घास से भी तुच्छ है। उसे वृक्ष से अधिक सहनशील होना चाहिए, मिथ्या प्रतिष्ठा की समस्त भावना से रहित होना चाहिए और दूसरों का सम्मान करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। ऐसे मनोभाव से व्यक्ति लगातार भगवान के पवित्र नाम का जप कर सकता है।" फिर भी, जब भगवान को सूचना दी गई कि नित्यानंद प्रभु को जगाई और माधई ने घायल कर दिया है तो वह तुरंत उस स्थान पर आग की भाँति क्रोधित होकर उन्हें मारने के लिए वहाँ पहुँचे। इस प्रकार भगवान चैतन्य ने अपने स्वयं के व्यवहार के उदाहरण से अपने छंद की व्याख्या की। व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध अपमानों को बर्दाश्त करना चाहिए, लेकिन जब अन्य वैष्णवों जैसे श्रेष्ठों के विरुद्ध निंदा होती है तब उसे न तो नम्र और न ही विनम्र रहना चाहिए उसे ऐसी निंदा का प्रतिकार करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए। यह गुरु और वैष्णवों के एक सेवक का कर्तव्य है। जो कोई भी गुरु और वैष्णवों के प्रति सनातन सेवा के सिद्धांत को समझता है वह श्रील रूप और श्रील सनातन गोस्वामी जैसे गुरुजनों पर तथाकथित विद्वान की जीत के संबंध में श्री जीवा गोस्वामी की कार्रवाई की सराहना करेगा।
श्रील जीवा गोस्वामी को बदनाम करने के लिए एक और कहानी बनाई गई है कि जब श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने उन्हें श्री चैतन्य-चरितामृत की नई-नवेली तैयार की गई पांडुलिपि दिखाई, तो जीवा गोस्वामी ने सोचा कि यह एक बड़े विद्वान के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को बाधित करेगा और इसलिए उन्होंने उसे कुएँ में फेंक दिया। इस कहानी के अनुसार, श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी बहुत हैरान हुए और तुरंत उनकी मृत्यु हो गई। सौभाग्य से, श्री चैतन्य-चरितामृत की पांडुलिपि की एक प्रति मुकुंद नामक व्यक्ति ने रखी थी और इसलिए बाद में पुस्तक को प्रकाशित करना संभव हुआ। यह कहानी गुरु और वैष्णव के विरुद्ध निंदा का एक और अपमानजनक उदाहरण है। ऐसी कहानी को कभी भी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
एक अन्य आरोप के अनुसार, श्रील जीव गोस्वामी ने व्रज-धाम के परकीया-रस के सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं किया और इसलिए स्वकीया-रस का समर्थन किया, यह दिखाते हुए कि राधा और कृष्ण शाश्वत रूप से विवाहित हैं। वास्तव में, जब जीव गोस्वामी जीवित थे, तब उनके कुछ अनुयायियों ने गोपियों के परकीया-रस को नापसंद किया था। इसलिए श्रील जीव गोस्वामी ने उनके आध्यात्मिक लाभ के लिए स्वकीया-रस का समर्थन किया, क्योंकि वह समझ सकते थे कि अन्यथा सहजिया परकीया-रस का शोषण करेंगे, जैसा कि वे वास्तव में वर्तमान समय में कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, वृंदावन और नवद्वीप में सहजियाओं के बीच उनकी व्यभिचार में यह फैशनेबल हो गया है कि परकीया-रस में तथाकथित भक्ति सेवा करने के लिए एक अविवाहित यौन साथी ढूंढा जाए। यह देखते हुए, श्रील जीव गोस्वामी ने स्वकीया-रस का समर्थन किया, और बाद में सभी वैष्णव आचार्यों ने भी इसे स्वीकार कर लिया। श्रील जीव गोस्वामी कभी भी पारलौकिक परकीया-रस के विरोधी नहीं रहे, और न ही किसी अन्य वैष्णव ने इसे अस्वीकार किया है। श्रील जीव गोस्वामी ने अपने पूर्ववर्ती गुरुओं और वैष्णवों, श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी का कड़ाई से पालन किया, और श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने उन्हें अपने प्रशिक्षक गुरुओं में से एक के रूप में स्वीकार किया।
