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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 78-79
 
 
श्लोक  1.10.78-79 
खण्डवासी मुकुन्द - दास, श्री - रघुनन्दन ।
नरहरि - दास, चिरञ्जीव, सुलोचन ॥78॥
एइ सब महाशाखा - चैतन्य - कृपाधाम ।
प्रेम - फल - फुल करे याहाँ ताहाँ दान ॥79॥
 
 
अनुवाद
श्री खंडवासी मुकुंद और उनके पुत्र रघुनंदन उस वृक्ष की उनतीसवीं शाखा थे, नरहरि चालीसवीं, चिरंजीव इकतालीसवीं और सुलोचना बयालीसवीं। ये सभी चैतन्य महाप्रभु के सर्व-दयालु वृक्ष की विशाल शाखाएँ थीं। उन्होंने सर्वत्र भगवान के प्रेम के फल और पुष्प वितरित किए।
 
Shrikhand resident Mukund and his son Shri Raghunandan were the forty-ninth branch of that tree, Narhari was the forty-ninth, Chiranjeev was the forty-one and Sulochan was the forty-second branch. All these were big branches of the tree of grace in the form of Sri Chaitanya Mahaprabhu. He distributed fruits and flowers of love for God everywhere.
तात्पर्य
श्री मुकुंद दास, नारायण दास के पुत्र और नरहरि सरकार के सबसे बड़े भाई थे। उनके दूसरे भाई का नाम माधव दास था और उनके बेटे को रघुनंदन दास नाम दिया गया था। रघुनंदन दास के वंशज अभी भी कटवा से चार मील पश्चिम में श्रीखंड नामक गाँव में रहते हैं, जहाँ रघुनंदन दास रहते थे। रघुनंदन का एक बेटा कानाई था, जिसके दो बेटे थे - मदन राय, जो नरहरि ठाकुर के शिष्य थे और वंशीवाधन। यह अनुमान है कि इस वंश में कम से कम चार सौ पुरुष हुए। उनके सभी नाम श्रीखंड गाँव में दर्ज हैं। गौर-गणोद्देश-दीपिका (175) में कहा गया है कि वृंदादेवी नाम की गोपी मुकुंद दास बनी, श्रीखंड गाँव में रही और श्री चैतन्य महाप्रभु को बहुत प्रिय थी। कृष्ण के प्रति उनकी अद्भुत भक्ति और प्रेम का वर्णन चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय पंद्रह में किया गया है। भक्ति-रत्नाकर (आठवीं तरंग) में कहा गया है कि रघुनंदन भगवान चैतन्य महाप्रभु की एक देवता की सेवा करते थे।

नरहरि दास सरकार एक बहुत प्रसिद्ध भक्त थे। श्री चैतन्य-मंगल के प्रसिद्ध लेखक लोचन दास ठाकुर उनके शिष्य थे। चैतन्य-मंगल में कहा गया है कि श्री गदाधर दास और नरहरि सरकार श्री चैतन्य महाप्रभु को अत्यंत प्रिय थे, लेकिन श्रीखंड गाँव के निवासियों के संबंध में कोई विशिष्ट विवरण नहीं है।

चिरंजीव और सुलोचना दोनों श्रीखंड के निवासी थे, जहाँ उनके वंशज अभी भी रह रहे हैं। चिरंजीव के दो बेटों में से बड़े, रामचंद्र कविराज, श्रीनिवास आचार्य के शिष्य और नरेंद्रनाथ दास ठाकुर के अंतरंग सहयोगी थे। छोटा बेटा गोविंद दास कविराज, प्रसिद्ध वैष्णव कवि थे। चिरंजीव की पत्नी सुनंदा थी और उनके ससुर का नाम दामोदर सेन कविराज था। चिरंजीव पहले गंगा नदी के तट पर, कुमारनगर गाँव में रहते थे। गौर-गणोद्देश-दीपिका (207) में कहा गया है कि वह पहले वृंदावन में चंद्रिका थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)