प्रभुर पड़या दुइ, पुरुषोत्तम, सञ्जय ।
व्याकरणे दुइ शिष्य दुइ महाशय ॥72॥
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अनुवाद
तैंतीसवीं और चौंतीसवीं शाखाएँ चैतन्य महाप्रभु के दो शिष्य थे, पुरुषोत्तम और संजय, जो व्याकरण के प्रखर विद्वान थे। वे बहुत महान व्यक्तित्व वाले थे।
Chaitanya Mahaprabhu had two disciples named Purushottam and Sanjaya, who were adept in grammar. They were great men.
तात्पर्य
ये दो छात्र नवद्वीप के निवासी थे और सांकीर्तन आंदोलन में प्रभु के पहले साथी थे। चैतन्य-भागवत के अनुसार, पुरुषोत्तम संजय मुकुंद संजय का पुत्र था, लेकिन श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने स्पष्ट किया है कि पुरुषोत्तम और संजय दो व्यक्ति थे, एक नहीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥