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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.10.7 
वन्दे श्री कृष्ण - चैतन्य - प्रेमामर - तरोः प्रियान् ।
शाखा - रूपान्भक्त - गणान्कृष्ण - प्रेम - फल - प्रदान् ॥7॥
 
 
अनुवाद
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी प्रिय भक्तों, भगवान के प्रेम के शाश्वत वृक्ष को प्रणाम करता हूँ। मैं इस वृक्ष की सभी शाखाओं, भगवान के भक्तों, जो कृष्ण प्रेम के फल बाँटते हैं, को अपना प्रणाम करता हूँ।
 
I offer my obeisances to all the beloved devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu, who are the eternal tree of divine love. I offer my obeisances to all the branches of this tree, who distribute the fruit of love for Krishna.
तात्पर्य
श्री कृष्णदास कवीराज गोस्वामी ने प्रभु चैतन्य के बिना किसी उच्च-निम्न भेद के, सभी प्रचारक भक्तों का स्तवन करने का उदाहरण दिया है। दुर्भाग्यवश, वर्तमान समय में कई मूर्ख तथाकथित चैतन्य देव के भक्त हैं जिनमें ऐसे भेद नजर आते हैं। उदाहरण के लिए, "प्रभुपाद" की उपाधि दिव्य गुरु को प्रदान की जाती है, विशेष रूप से विशिष्ट दिव्य गुरु को, जैसे श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद, श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद या श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद। जब हमारे शिष्यों ने भी इसी तरह से अपने दिव्य गुरु को प्रभुपाद कहकर संबोधित करना चाहा तो कुछ मूढ़ ईर्ष्यालु हो गए। हरे कृष्ण आंदोलन के प्रचार कार्यों को नजरअंदाज करके, केवल इसलिए कि इन शिष्यों ने अपने दिव्य गुरु को प्रभुपाद कहकर संबोधित किया, वे इतने ईर्ष्यालु हो गए कि उन्होंने अन्य ऐसे ही ईर्ष्यालु लोगों का एक गुट बनाकर कृष्णभावना आंदोलन के मूल्य को कम करने का प्रयास किया। ऐसे मूर्खों को दंडित करने के लिए, कृष्णदास कवीराज गोस्वामी स्पष्ट रूप से कहते हैं, केहा करीबार नारे ज्येष्ठ-लघु-क्रम। जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय का सच्चा प्रचारक है, उसे भगवान चैतन्य के वास्तविक भक्तों का सम्मान करना चाहिए; किसी को ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, किसी प्रचारक को बहुत महान और किसी को बहुत हीन समझते हुए। यह एक भौतिक भेद है जिसका आध्यात्मिक गतिविधियों के मंच पर कोई स्थान नहीं है। इसलिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय के सभी प्रचारकों को समान रूप से सम्मान देते हैं, जिनकी तुलना पेड़ की शाखाओं से की जाती है। आईएसकेसीओएन इन शाखाओं में से एक है, और इसलिए भगवान चैतन्य महाप्रभु के सभी निष्ठावान भक्तों द्वारा इसका सम्मान किया जाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)