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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.10.63 
श्री - वल्लभसेन, आर सेन श्रीकान्त ।
शिवानन्द - सम्बन्धे प्रभुर भक्त एकान्त ॥63॥
 
 
अनुवाद
श्रीवल्लभ सेना और श्रीकांत सेना भी शिवानंद सेना की उपशाखाएँ थीं, क्योंकि वे न केवल उनके भतीजे थे, बल्कि श्री चैतन्य महाप्रभु के अनन्य भक्त भी थे।
 
Shri Vallabh Sen and Shrikant Sen were also sub-branches of Shivananda Sen, as they were not only his nephews but also ardent devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
जब भगवान नित्यानंद प्रभु ने पुरी जाते समय शिवानंद सेना को फटकारा, तो शिवानंद के ये दो भतीजे विरोध के रूप में दल को छोड़कर जगतनाथपुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन करने चले गए। प्रभु लड़कों की भावना को समझ सकते थे, और उन्होंने अपने निजी सहायक गोविंद को आदेश दिया कि वे तब तक लड़कों को प्रसाद दिया करें जब तक शिवानंद का दल नहीं आ जाता। रथयात्रा संकीर्तन पर्व के दौरान ये दोनों भाई मुकुंद के नेतृत्व वाले दल का हिस्सा थे। गौरा-गणोद्देश-दीपिका (174) में कहा गया है कि कात्यायनी नामक गोपी श्रीकांत सेना के रूप में अवतरित हुई थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)