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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  1.10.62 
चैतन्य - दास, रामदास, आर कर्णपूर ।
तिन पुत्र शिवानन्देर प्रभुर भक्त - शूर ॥62॥
 
 
अनुवाद
शिवानन्द सेना के तीन पुत्र, चैतन्यदास, रामदास और कर्णपुर, भगवान चैतन्य के वीर भक्त थे।
 
Shivananda Sen's three sons – Chaitanya Das, Ram Das and Karnapur – were valiant devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
शिवानंद सेन के ज्येष्ठ पुत्र चैतन्य दास ने कृष्ण-कर्नामृत पर एक टीका लिखी थी जिसे बाद में श्रील भक्त विनोद ठाकुर ने अपने पेपर सज्जन-तोषणी में अनुवाद किया था। विशेषज्ञों की राय के अनुसार, चैतन्य दास संस्कृत में लिखी गई चैतन्य-चरित (चैतन्य चरितामृत के नाम से भी जानी जाती है) पुस्तक के लेखक थे। लेखक कवि-करनपूर नहीं थे, जैसा कि आम तौर पर माना जाता है। यह श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर की राय है। श्री रामदास शिवानंद सेन के दूसरे पुत्र थे। गौर-गणोद्देश-दीपिका (145) में कहा गया है कि कृष्ण-लीला में दक्ष और विचक्षण नाम के दो प्रसिद्ध तोते कवि-करनपूर के बड़े भाई बने, अर्थात् चैतन्य दास और रामदास। तीसरे पुत्र करनपूर, जिन्हें परमानंद दास या पुरी दास के नाम से भी जाना जाता था, की दीक्षा श्रीनाथ पंडित ने की थी, जो श्री आदित्य प्रभु के शिष्य थे। करनपूर ने वैष्णव साहित्य में महत्वपूर्ण कई पुस्तकें लिखीं, जैसे आनंद-वृंदावन-चम्पू, अलंकार-कौस्तुभ, गौर-गणोद्देश-दीपिका और महान महाकाव्य चैतन्य-चंद्रोदय-नाटक। उनका जन्म 1448 शकाब्द (1526 ई.) में हुआ था। उन्होंने 1488 से 1498 तक लगातार दस वर्षों तक किताबें लिखीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)