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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  1.10.60 
आस्वादिल ए सब रस सेन शिवानन्द ।
विस्ता रि’ कहिब आगे एसब आनन्द ॥60॥
 
 
अनुवाद
श्रील शिवानन्द सेना ने साक्षात्, आवेश और आविर्भाव इन तीनों गुणों का अनुभव किया। बाद में मैं इस दिव्य आनंदमय विषय का विशद वर्णन करूँगा।
 
Srila Sivananda Sen experienced all three characteristics: direct perception, passion, and manifestation. I will elaborate on this transcendentally blissful topic later.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती महा राज द्वारा श्रील शिवानंद सेन का वर्णन इस प्रकार किया गया है: ''शिवानंद सेन कुमारहट्टा, जो कि हालीसाहर के नाम से भी जाना जाता है, के निवासी थे और भगवान् के महान भक्त थे। कुमारहट्टा से लगभग डेढ़ मील की दूरी पर कांच्प्पाड़ा नामक एक और गांव है, जहाँ शिवानंद सेन द्वारा स्थापित गौर-गोपाल देवता विराजमान हैं, जिन्होंने कृष्णराय का एक मंदिर भी स्थापित किया जो कि अभी भी विद्यमान है। शिवानंद सेन परमानंद सेन के पिता थे, जिन्हें पुरी दास या कवि-कर्णपूर के नाम से भी जाना जाता था। परमानंद सेन ने अपने गौर-गणोद्धेश-दीपिका (176) में लिखा है कि वृंदावन की दो गोपियों, जिनके पहले के नाम वीरा और दूती थे, मिलकर उनके पिता बने। श्रील शिवानंद सेन ने भगवान् चैतन्य के उन सभी भक्तों का मार्गदर्शन किया जो बंगाल से जगन्नाथपुरी गए थे, और उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उनकी यात्रा के सभी खर्चों को वहन किया। यह चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय सोलह के श्लोक 19 से 27 में वर्णित है। श्रील शिवानंद सेन के तीन पुत्र थे, जिनके नाम चैतन्य दास, रामदास और परमानंद थे। जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह अंतिम पुत्र बाद में कवि-कर्णपूर बने और उन्होंने गौर-गणोद्धेश-दीपिका लिखी। उनके आध्यात्मिक गुरु श्रीनाथ पंडित थे, जो शिवानंद सेन के पुजारी थे। वासुदेव दत्त के भव्य व्यय के कारण, शिवानंद सेन को उनके खर्चों की निगरानी के लिए नियुक्त किया गया था।''

श्री शिवानंद सेन ने वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु के साक्षात्, आवेश और आविर्भाव के गुणों का अनुभव किया। एक बार वह जगन्नाथपुरी की यात्रा पर जाते समय एक कुत्ते को अपने साथ ले गए, और अत्य-लीला, प्रथम अध्याय में वर्णित है कि बाद में इस कुत्ते को उनके संग के कारण मोक्ष प्राप्त हुआ। जब श्रील रघुनाथ दास, जो बाद में रघुनाथ दास गोस्वामी बने, श्री चैतन्य महाप्रभु से जुड़ने के लिए अपने पैतृक घर से भाग गए, तो उनके पिता ने शिवानंद सेन को एक पत्र लिखकर उनके बारे में जानकारी दी। शिवानंद सेन ने उन्हें उन विवरणों की आपूर्ति की जिसके लिए उन्होंने अनुरोध किया था, और बाद में रघुनाथ दास गोस्वामी के पिता ने रघुनाथ दास गोस्वामी की देखभाल के लिए कुछ नौकर और धन शिवानंद सेन को भेजा। एक बार श्री शिवानंद सेन ने भगवान् चैतन्य महाप्रभु को अपने घर आमंत्रित किया और उन्हें इतना शानदार भोजन कराया कि भगवान को अपच हो गया और वह कुछ बीमार हो गए। यह शिवानंद सेन के सबसे बड़े बेटे चैतन्य दास को पता चला, जिन्होंने भगवान को ऐसे भोजन दिए जिससे उनकी पाचन शक्ति में मदद मिलेगी, और इस तरह भगवान चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। यह अत्य-लीला, दसवें अध्याय के श्लोक 142 से 151 में वर्णित है।

एक बार जगन्नाथपुरी जाते समय, सभी भक्तों को एक पेड़ के नीचे ठहरना पड़ा, बिना किसी घर या शेड की आड़ के, और नित्यानंद प्रभु बहुत क्रोधित हो गए, जैसे कि वह भूख से बहुत परेशान हों। इस प्रकार उन्होंने शिवानंद के पुत्रों को मरने का शाप दिया। शिवानंद की पत्नी इस पर बहुत दुखी हुईं और वह रोने लगीं। वह बहुत गंभीरता से सोचती थीं कि चूंकि उनके बेटों को नित्यानंद प्रभु ने शाप दिया था, निश्चित रूप से वे मर जाएंगे। जब शिवानंद बाद में लौटे और अपनी पत्नी को रोते देखा, तो उन्होंने कहा, ''तुम क्यों रो रही हो? अगर श्री नित्यानंद प्रभु चाहेंगे तो हम सभी मर जाएंगे।'' जब शिवानंद सेन लौटे और श्रील नित्यानंद प्रभु ने उन्हें देखा, तो भगवान ने उन्हें बुरी तरह से लात मारी, यह शिकायत करते हुए कि वह बहुत भूखे हैं, और पूछा कि उन्होंने उनके भोजन की व्यवस्था क्यों नहीं की। भगवान का अपने भक्तों के साथ ऐसा ही व्यवहार है। श्रील नित्यानंद प्रभु एक साधारण भूखे व्यक्ति की तरह व्यवहार करते थे, जैसे कि शिवानंद सेन की व्यवस्था पर पूरी तरह से निर्भर हों।

शिवानंद सेन के एक भतीजे श्रीकांत ने नित्यानंद प्रभु के शाप के विरोध में संग छोड़ दिया और सीधे जगन्नाथपुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गए, जहां भगवान ने उन्हें शांत किया। उस अवसर पर, भगवान चैतन्य महाप्रभु ने पुरी दास, जो उस समय एक बच्चे थे, को अपने पैर की अंगुली चूसने की अनुमति दी थी। चैतन्य महाप्रभु के आदेश से ही वह तुरंत संस्कृत छंदों की रचना कर सकते थे। शिवानंद के परिवार के साथ गलतफहमी के दौरान, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने निजी परिचारक गोविंद को आदेश दिया कि वह उन्हें अपने भोजन के सभी अवशेष दे दें। यह अत्य-लीला, अध्याय बारह, श्लोक 53 में वर्णित है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)