श्री शिवानंद सेन ने वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु के साक्षात्, आवेश और आविर्भाव के गुणों का अनुभव किया। एक बार वह जगन्नाथपुरी की यात्रा पर जाते समय एक कुत्ते को अपने साथ ले गए, और अत्य-लीला, प्रथम अध्याय में वर्णित है कि बाद में इस कुत्ते को उनके संग के कारण मोक्ष प्राप्त हुआ। जब श्रील रघुनाथ दास, जो बाद में रघुनाथ दास गोस्वामी बने, श्री चैतन्य महाप्रभु से जुड़ने के लिए अपने पैतृक घर से भाग गए, तो उनके पिता ने शिवानंद सेन को एक पत्र लिखकर उनके बारे में जानकारी दी। शिवानंद सेन ने उन्हें उन विवरणों की आपूर्ति की जिसके लिए उन्होंने अनुरोध किया था, और बाद में रघुनाथ दास गोस्वामी के पिता ने रघुनाथ दास गोस्वामी की देखभाल के लिए कुछ नौकर और धन शिवानंद सेन को भेजा। एक बार श्री शिवानंद सेन ने भगवान् चैतन्य महाप्रभु को अपने घर आमंत्रित किया और उन्हें इतना शानदार भोजन कराया कि भगवान को अपच हो गया और वह कुछ बीमार हो गए। यह शिवानंद सेन के सबसे बड़े बेटे चैतन्य दास को पता चला, जिन्होंने भगवान को ऐसे भोजन दिए जिससे उनकी पाचन शक्ति में मदद मिलेगी, और इस तरह भगवान चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। यह अत्य-लीला, दसवें अध्याय के श्लोक 142 से 151 में वर्णित है।
एक बार जगन्नाथपुरी जाते समय, सभी भक्तों को एक पेड़ के नीचे ठहरना पड़ा, बिना किसी घर या शेड की आड़ के, और नित्यानंद प्रभु बहुत क्रोधित हो गए, जैसे कि वह भूख से बहुत परेशान हों। इस प्रकार उन्होंने शिवानंद के पुत्रों को मरने का शाप दिया। शिवानंद की पत्नी इस पर बहुत दुखी हुईं और वह रोने लगीं। वह बहुत गंभीरता से सोचती थीं कि चूंकि उनके बेटों को नित्यानंद प्रभु ने शाप दिया था, निश्चित रूप से वे मर जाएंगे। जब शिवानंद बाद में लौटे और अपनी पत्नी को रोते देखा, तो उन्होंने कहा, ''तुम क्यों रो रही हो? अगर श्री नित्यानंद प्रभु चाहेंगे तो हम सभी मर जाएंगे।'' जब शिवानंद सेन लौटे और श्रील नित्यानंद प्रभु ने उन्हें देखा, तो भगवान ने उन्हें बुरी तरह से लात मारी, यह शिकायत करते हुए कि वह बहुत भूखे हैं, और पूछा कि उन्होंने उनके भोजन की व्यवस्था क्यों नहीं की। भगवान का अपने भक्तों के साथ ऐसा ही व्यवहार है। श्रील नित्यानंद प्रभु एक साधारण भूखे व्यक्ति की तरह व्यवहार करते थे, जैसे कि शिवानंद सेन की व्यवस्था पर पूरी तरह से निर्भर हों।
शिवानंद सेन के एक भतीजे श्रीकांत ने नित्यानंद प्रभु के शाप के विरोध में संग छोड़ दिया और सीधे जगन्नाथपुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गए, जहां भगवान ने उन्हें शांत किया। उस अवसर पर, भगवान चैतन्य महाप्रभु ने पुरी दास, जो उस समय एक बच्चे थे, को अपने पैर की अंगुली चूसने की अनुमति दी थी। चैतन्य महाप्रभु के आदेश से ही वह तुरंत संस्कृत छंदों की रचना कर सकते थे। शिवानंद के परिवार के साथ गलतफहमी के दौरान, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने निजी परिचारक गोविंद को आदेश दिया कि वह उन्हें अपने भोजन के सभी अवशेष दे दें। यह अत्य-लीला, अध्याय बारह, श्लोक 53 में वर्णित है।
