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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  1.10.59 
ताँहाते हइल चैतन्येर ‘आविर्भाव’ ।
अलौकिक ऐछे प्रभुर अनेक स्वभाव ॥59॥
 
 
अनुवाद
उनके शरीर में आविर्भाव के लक्षण थे। ऐसे दर्शन दुर्लभ हैं, किन्तु भगवान चैतन्य महाप्रभु ने अपने विभिन्न स्वरूपों द्वारा ऐसी अनेक लीलाएँ प्रदर्शित कीं।
 
His body showed signs of manifestation. Such manifestations are supernatural, but Sri Chaitanya Mahaprabhu performed many such pastimes through his various forms.
तात्पर्य
गौर-गणोद्देस-दीपिका (73-74) में कहा गया है कि नकुल ब्रह्मचारी ने prowess (आवेश) और प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ने श्री चैतन्य महाप्रभु का रूप (आविर्भाव) प्रदर्शित किया था। भगवान चैतन्य के कई सैकड़ों और हजारों भक्त हैं जिनमें कोई विशेष लक्षण नहीं हैं, लेकिन जब भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्त विशिष्ट prowess के साथ कार्य करते हैं, तो वे आविर्भाव नामक विशेषता प्रदर्शित करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से संकीर्तन आंदोलन का प्रसार किया और उन्होंने भारतवर्ष के सभी निवासियों को अपने पंथ को अपनाने और इसे पूरी दुनिया में प्रचारित करने की सलाह दी थी। ऐसे निर्देशों का पालन करने वाले भक्तों के दिखाई देने वाले शारीरिक लक्षणों को आविर्भाव कहा जाता है। श्रील शिवानंद सेन ने नकुल ब्रह्मचारी में इस तरह के आविर्भाव लक्षण देखे, जिन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह ही लक्षण प्रदर्शित किए। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि कलियुग में एकमात्र आध्यात्मिक कार्य भगवान के पवित्र नाम का प्रसार करना है, लेकिन यह कार्य केवल वही कर सकता है जिसे वास्तव में भगवान कृष्ण ने सशक्त किया है। जिस प्रक्रिया द्वारा भक्त को इस प्रकार सशक्त किया जाता है, उसे आविर्भाव कहा जाता है, या कभी-कभी इसे शक्ति-आविर्भाव कहा जाता है।

प्रद्युम्न ब्रह्मचारी पहले कालना के पियारीगंज नामक गाँव का निवासी था। उनका वर्णन श्री चैतन्य-चरितामृत की अंत्य-लीला में, दूसरे अध्याय में और श्री चैतन्य-भागवत के अंत्य-खंड में, अध्याय तीन और नौ दिया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)