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अनुवाद
श्रील मुरारी गुप्त ने न तो कभी दोस्तों से दान लिया और न ही किसी से पैसा लिया। वे एक चिकित्सक के रूप में काम करते थे और अपनी कमाई से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।
Srila Murari Gupta never accepted donations from his friends, nor did he accept money from anyone. He supported his family by working as a physician.
तात्पर्य
यह ध्यान रखना चाहिए कि एक गृहस्थ को किसी से भीख मांग कर अपना जीवन यापन नहीं करना चाहिए। उच्च जातियों के प्रत्येक गृहस्थ को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के रूप में अपने व्यवसायिक कर्तव्य में स्वयं को व्यस्त रखना चाहिए, लेकिन उसे दूसरों की सेवा में नहीं लगना चाहिए, क्योंकि यह एक शूद्र का कर्तव्य है। एक को केवल वही स्वीकार करना चाहिए जो वह अपने पेशे से कमाता है। ब्राह्मण के कार्य यजन, याजन, पाठन, पाठन, दान और प्रतिग्रह हैं। एक ब्राह्मण को विष्णु का उपासक होना चाहिए, और उसे दूसरों को भी उन्हें पूजने की शिक्षा देनी चाहिए। एक क्षत्रिय भूमिधर बन सकता है और किरायेदारों से कर या किराया वसूल कर अपना जीवनयापन कर सकता है। वैश्य कृषि या सामान्य व्यापार को व्यावसायिक कर्तव्य के रूप में स्वीकार कर सकता है। चूंकि मुरारी गुप्त का जन्म एक चिकित्सक के परिवार (वैद्य-वंश) में हुआ था, उन्होंने एक चिकित्सक के रूप में अभ्यास किया, और अपनी कमाई से उन्होंने अपने परिवार का भरण-पोषण किया। जैसा कि श्रीमद-भागवतम में कहा गया है, प्रत्येक को अपने व्यावसायिक कर्तव्य के निष्पादन के माध्यम से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। वही जीवन की पूर्णता है। इस प्रणाली को दैवी-वर्णाश्रम कहा जाता है। मुरारी गुप्त एक आदर्श गृहस्थ थे, क्योंकि वह भगवान रामचंद्र और चैतन्य महाप्रभु के महान भक्त थे। एक चिकित्सक के रूप में अभ्यास करके उन्होंने अपने परिवार का भरण-पोषण किया और साथ ही भगवान चैतन्य को अपनी सर्वोत्तम क्षमता से संतुष्ट किया। यही गृहस्थ जीवन का आदर्श है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥