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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.10.43 
हरिदास - ठाकुर शाखार अद्भुत चरित ।
तिन लक्ष नाम तेंहो लयेन अपतित ॥43॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य वृक्ष की बीसवीं शाखा हरिदास ठाकुर थे। उनका चरित्र अद्भुत था। वे प्रतिदिन बिना रुके तीन लाख बार कृष्ण के पवित्र नाम का जप करते थे।
 
The twentieth branch of the Chaitanya tree was Haridasa Thakura. His character was remarkable. He chanted the name of Krishna 300,000 times daily, without interruption.
तात्पर्य
निश्चित रूप से प्रभु के 300,000 पवित्र नामों का जाप करना अद्भुत है। कोई भी साधारण व्यक्ति इतने नाम नहीं जाप सकता है, और न ही किसी को कृत्रिम रूप से हरिदास ठाकुर के व्यवहार का अनुकरण करना चाहिए। हालाँकि, यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने के लिए एक विशिष्ट प्रतिज्ञा पूरी करे। इसलिए हमने अपने समाज में निर्देशित किया है कि हमारे सभी छात्रों को प्रतिदिन कम से कम सोलह राउंड का जाप करना होगा। उच्च गुणवत्ता के होने के लिए ऐसा जप बिना अपराध का होना चाहिए। पवित्र नाम का बिना अपराधों के जप करने से यांत्रिक जप उतना शक्तिशाली नहीं होता है। चैतन्य-भागवत, आदि-खंड, अध्याय दो में कहा गया है कि हरिदास ठाकुर का जन्म बुढना नामक एक गाँव में हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद वह शांतिपुर के पास फुलिया में गंगा के तट पर रहने आ गए थे। आदी-खंड चैतन्य-भागवत के सोलहवें अध्याय में पाए जाने वाले मुस्लिम मजिस्ट्रेट द्वारा उनकी सजा के वर्णन से, हम समझ सकते हैं कि हरिदास ठाकुर कितने विनम्र और नम्र थे और उन्होंने प्रभु की निःस्वार्थ दया कैसे प्राप्त की। भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा निभाए गए नाटकों में, हरिदास ठाकुर ने पुलिस प्रमुख की भूमिका निभाई। बेनापोल में हरे कृष्ण महा-मंत्र का जाप करते हुए, मायादेवी ने स्वयं उनकी परीक्षा ली। हरिदास ठाकुर के निधन का वर्णन चैतन्य-चरितामृत के अंत्य-लीला, ग्यारहवें अध्याय में किया गया है। यह निश्चित रूप से निश्चित नहीं है कि श्री हरिदास ठाकुर खुल्ना जिले में बुढना नामक गांव में प्रकट हुए थे। पूर्व में यह गांव सातक्षीरा मंडल के भीतर चौबीस परगना जिले के भीतर था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)