श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.10.42 
जगते यतेक जीव, तार पाप ला ।
नरक भुञ्जिते चाहे जीव छाड़ाइया ॥42॥
 
 
अनुवाद
श्रील वासुदेव दत्त ठाकुर संसार के सभी लोगों के पाप कर्मों के कारण कष्ट सहना चाहते थे, ताकि भगवान चैतन्य महाप्रभु उनका उद्धार कर सकें।
 
Srila Vasudeva Datta Thakura wanted to bear the consequences of the sins of the people of the entire world so that Chaitanya Mahaprabhu could liberate them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)