शुक्लाम्बर - ब्रह्मचारी बड़ भाग्यवान् ।
याँर अन्न मा गि’ काड़ि’ खाइला भगवान् ॥38॥
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अनुवाद
सोलहवीं शाखा, शुक्लम्बर ब्रह्मचारी, बहुत भाग्यशाली थे क्योंकि भगवान चैतन्य महाप्रभु उनसे मजाक में या गंभीरता से भोजन मांगते थे या कभी-कभी उनसे जबरदस्ती छीनकर खा लेते थे।
The sixteenth branch, Shuklambar Brahmacharis were extremely fortunate, because Chaitanya Mahaprabhu would jokingly or seriously ask for food from them and sometimes would snatch it from them by force and eat it.
तात्पर्य
यह कहा गया है कि नवद्वीप के निवासी शुक्लांबर ब्रह्मचारी, सांकीर्तन आंदोलन में भगवान चैतन्य महाप्रभु के पहले साथी थे। जब भगवान चैतन्य दीक्षा के बाद गया से लौटे, तो वे शुक्लांबर ब्रह्मचारी के साथ रहे क्योंकि वे इस भक्त से भगवान कृष्ण के आनंदोत्सव के बारे में सुनना चाहते थे। शुक्लांबर ब्रह्मचारी नवद्वीप के निवासियों से चावल का भिक्षा एकत्र करते थे, और श्री चैतन्य महाप्रभु उनके द्वारा पकाए गए चावल को खाने में आनंद पाते थे। ऐसा कहा जाता है कि शुक्लांबर ब्रह्मचारी, वृंदावन में भगवान कृष्ण के आनंदोत्सव के समय यज्ञीय ब्राह्मणों की पत्नियों में से एक थीं। भगवान कृष्ण यज्ञीय ब्राह्मणों की पत्नियों से भोजन मांगते थे, और भगवान चैतन्य महाप्रभु ने शुक्लांबर ब्रह्मचारी से चावल मांगकर एक समान आनंदोत्सव किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥