नारायण - पण्डित एक बड़ई उदार ।
चैतन्य - चरण विनु नाहि जाने आर ॥36॥
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अनुवाद
चौदहवीं शाखा के महान एवं उदार भक्त नारायण पंडित को भगवान चैतन्य के चरणकमलों के अतिरिक्त कोई आश्रय नहीं मालूम था।
The fourteenth branch was Narayana Pandit, who was a great and generous devotee and knew no other refuge except the lotus feet of Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
नारायण पंडित श्रीवास ठाकुर के सहचरियों में से एक थे। चैतन्य भागवत के अंत्य खंड, अध्याय आठ, श्लोक 36 में उल्लेख किया गया है कि वह ठाकुर के भाई श्री राम पंडित के साथ जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने गए थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥