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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.10.35 
श्रीनृसिंह - उपासक - प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ।
प्रभु ताँर नाम कैला ‘नृसिंहानन्द’ करि’ ॥35॥
 
 
अनुवाद
तेरहवीं शाखा प्रद्युम्न ब्रह्मचारी की थी। चूँकि वे भगवान नृसिंहदेव के उपासक थे, इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका नाम बदलकर नृसिंहानंद ब्रह्मचारी रख दिया।
 
Pradyumna, the thirteenth branch, was a Brahmachari. Because he was a devotee of Lord Nrisimhadeva, Sri Chaitanya Mahaprabhu changed his name to Nrisimhananda Brahmachari.
तात्पर्य
श्री चैतन्य-चरितामृत के अंत्य-लीला, द्वितीय अध्याय में प्रद्युम्न ब्रह्मचारी का वर्णन किया गया है। वे भगवान चैतन्य के एक महान भक्त थे, जिन्होंने उनका नाम नृसिंहानंद रख दिया था। पाणिहाटी में राघव पंडित के घर से शिवानंद के घर आते समय, भगवान चैतन्य महाप्रभु नृसिंहानंद ब्रह्मचारी के हृदय में प्रकट हुए। इसे स्वीकार करने के लिए, नृसिंहानंद ब्रह्मचारी तीन देवताओं, अर्थात जगन्नाथ, नृसिंहदेव और भगवान चैतन्य महाप्रभु के भोजन को भोजन के रूप में स्वीकार करते थे। यह चैतन्य-चरितामृत, अंत्य-लीला, द्वितीय अध्याय में, 48 से 78 तक के छंदों में कहा गया है। यह जानकारी प्राप्त करने पर कि भगवान चैतन्य महाप्रभु कुलिया से वृंदावन की ओर जा रहे हैं, नृसिंहानंद ने स्वयं को ध्यान में लीन कर लिया और अपनी मानसिक गतिविधियों द्वारा कुलिया से वृंदावन तक एक बहुत अच्छी सड़क का निर्माण शुरू कर दिया। हालाँकि, अचानक, उन्होंने अपना ध्यान तोड़ दिया और अन्य भक्तों को बताया कि इस बार भगवान चैतन्य महाप्रभु वृंदावन नहीं जाएँगे बल्कि केवल कानाई नाटशाला नामक स्थान तक ही यात्रा करेंगे। इसका वर्णन मध्य-लीला, अध्याय एक, छंद 155 से 162 में किया गया है। गौर-गणोद्देश-दीपिका (74) कहती है, आवेशश्च तथाज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्न-संज्ञके: श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रद्युम्न मिश्र, या प्रद्युम्न ब्रह्मचारी का नाम बदलकर नृसिंहानंद ब्रह्मचारी रखा, क्योंकि उनके हृदय में भगवान नृसिंहदेव प्रकट हुए थे। ऐसा कहा जाता है कि भगवान नृसिंहदेव उनसे सीधे बात करते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)