चैतन्य - पार्षद - श्री - आचार्य पुरन्दर ।
पिता क रि’ याँरे बले गौराङ्ग - सुन्दर ॥30॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
नौवीं शाखा, श्रीआचार्य पुरंदर, भगवान चैतन्य के निरंतर सहयोगी थे। भगवान ने उन्हें अपने पिता के रूप में स्वीकार किया।
Sri Acharya Purandara was the ninth branch, a constant associate of Sri Chaitanya Mahaprabhu. Mahaprabhu considered him as his father.
तात्पर्य
चैतन्य-भागवत में वर्णन है कि भगवान चैतन्य महाप्रभु जब भी श्री राघव पंडित के घर पर जाते थे तो पुरंदर आचार्य को आमंत्रण प्राप्त होते ही वहाँ जाते थे। पुरंदर आचार्य परम भाग्यशाली थे क्योंकि प्रभु उन्हें "ताता" कहकर संबोधित करते थे और बहुत प्रेम से गले मिलते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥