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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.10.24 
राघव - पण्डित - प्रभुर आद्य - अनुचर ।
ताँर एक शाखा मुख्य - मकरध्वज कर ॥24॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के मूल अनुयायी, राघव पंडित, सातवीं शाखा माने जाते हैं। उनसे एक और उपशाखा निकली, जिसका नेतृत्व मकरध्वज करण ने किया।
 
The Raghava Pandits, the original followers of Sri Chaitanya Mahaprabhu, are said to be the seventh branch. Another sub-branch emerged from them, headed by Makardhwaj Kar.
तात्पर्य
मकरध्वज का उपनाम करा था। वर्तमान समय में यह उपनाम सामान्यतः कायस्थ समुदाय में मिलता है। गौरा-गणोद्देश-दीपिका (166) में कहा गया है:

धन्यिष्ठा भक्ष्य-सामग्रीं कृष्णाय दाद व्रजेऽमिताम्

सैव सांप्रतं गौरांग-प्रियो राघव-पंडित:

राघव पंडित पूर्वकाल में भगवान कृष्ण के लीला काल में व्रज की एक सखी गोपी थीं और उसका नाम धन्यिष्ठा था। यह गोपी धन्यिष्ठा सदा कृष्ण के लिए अन्न बनाती थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)