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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.10.19 
“दश - सहस्र गन्धर्व मोरे दे ह’ चन्द्रमुख ।
तारा गाय, मुञि नाचों - तबे मोर सुख” ॥19॥
 
 
अनुवाद
"हे चन्द्रमुख! कृपया मुझे दस हज़ार गंधर्व दीजिए। जब ​​मैं नाचूँ तो वे गाएँ, और मुझे बहुत खुशी होगी।"
 
"O moon-faced one, please give me ten thousand Gandharvas. When I dance and they sing, I will be extremely happy."
तात्पर्य
गंधर्वालोक के निवासी गंधर्वों को स्वर्गीय गायकों के रूप में मनाया जाता है। जब भी स्वर्गीय ग्रहों में गायन की आवश्यकता होती है, गंधर्वों को गाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। गंधर्व लगातार कई दिनों तक गा सकते हैं, और इसलिए वक्रेश्वर पंडिता उनके गाने पर नृत्य करना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)