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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.10.17 
वक्रेश्वर पण्डित - प्रभुर बड़ प्रिय भृत्य ।
एक - भावे चब्बिश प्रहर याँर नृत्य ॥17॥
 
 
अनुवाद
वृक्ष की पाँचवीं शाखा, वक्रेश्वर पंडित, भगवान चैतन्य के अत्यंत प्रिय सेवक थे। वे बहत्तर घंटे तक निरंतर आनंद में नृत्य कर सकते थे।
 
Vakresvara Pandita, the fifth branch of the tree, was a very dear servant of Sri Chaitanya Mahaprabhu. He could dance in ecstasy for seventy-two hours continuously.
तात्पर्य
गौर-गणोद्देश-दीपिका (७१) में यह वर्णित है कि वक्रेश्वर पंडित अनिरुद्ध का अवतार था, जो विष्णु के चार विस्तारों (वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध और प्रद्युम्न) में से एक था। वह लगातार सत्तर-दो घंटों तक अद्भुत तरीके से नृत्य कर सकता था। जब भगवान चैतन्य महाप्रभु श्रीवास पंडित के घर में नाटकीय प्रदर्शनों में अभिनय करते थे, वक्रेश्वर पंडित मुख्य नर्तकों में से एक थे, और वह लगातार उतने समय तक नृत्य करते थे। भगवान चैतन्य महाप्रभु के एक उड़िया भक्त श्री गोविंद दास ने अपनी पुस्तक गौर-कृष्णोदय में वक्रेश्वर पंडित के जीवन का वर्णन किया है। उड़ीसा में वक्रेश्वर पंडित के कई शिष्य हैं, और वे गौड़ीय वैष्णव के रूप में जाने जाते हैं, हालांकि वे उड़िया हैं। इन शिष्यों में श्री गोपालगुरु और उनके शिष्य श्री ध्यानचंद्र गोस्वामी हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)