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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  1.10.160 
एकैक - शाखाते लागे कोटि कोटि डाल ।
तार शिष्य - उपशिष्य, तार उपड़ाल ॥160॥
 
 
अनुवाद
वृक्ष की प्रत्येक शाखा से शिष्यों और महाशिष्यों की सैकड़ों-हजारों उपशाखाएं निकली हैं।
 
From each branch of the tree, millions of sub-branches of disciples and trainees have emerged.
तात्पर्य
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की यह इच्छा थी कि उनकी भक्ति का प्रसार पूरे विश्व में हो। इसलिए, अब उनके शिष्य समुदाय की कई शाखाओं के और भी शिष्यों की अति आवश्यकता है। उनकी भक्ति का प्रचार केवल कुछ गांवों, या बंगाल, या भारत तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह पूरे विश्व में फैलना चाहिए। यह बहुत ही दुखद है कि तथाकथित स्वार्थी भक्त, शांतिपूर्वक सन्यास स्वीकार करने और संपूर्ण विश्व में भगवान श्री चैतन्य की भक्ति का प्रसार करने के लिए, इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस (इस्कॉन) के सदस्यों का आलोचना करते हैं। हमारा काम किसी की आलोचना करना नहीं है, लेकिन चूँकि वे इस आंदोलन में गलतियां ढूंढने का प्रयास करते हैं, इसलिए हमें वास्तविक सच्चाई का वर्णन करना होगा। श्री चैतन्य महाप्रभु संपूर्ण विश्व में अपने भक्त चाहते थे, और श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर और श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इसकी पुष्टि की है। इसी इच्छा की प्राप्ति के लिए, इस्कॉन आंदोलन का पूरे विश्व में प्रचार किया जा रहा है। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के वास्तविक भक्तों को कृष्ण चेतना आंदोलन के प्रचार में गर्व महसूस करना चाहिए, न कि इसके प्रचार कार्य की निंदा करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)