कृष्णदास नाम शुद्ध कुलीन ब्राह्मण ।
यारे सड़े लैया कैला दक्षिण गमन ॥145॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
बाईसवें भक्त, कृष्णदास, एक शुद्ध और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। दक्षिण भारत की यात्रा करते समय, भगवान चैतन्य कृष्णदास को अपने साथ ले गए।
The twenty-second devotee, Krishnadasa, was born into a pure and respectable Brahmin family. When Mahaprabhu was traveling through South India, he took Krishnadasa with him.
तात्पर्य
कृष्णादास का वर्णन मध्यलीला के सातवें और नौवें अध्याय में मिलता है। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ उनकी कमंडल लेकर चलते थे। मालाबार राज्य में, भट्टाचार्य संप्रदाय के लोगों ने एक स्त्री को प्रलोभन देकर कृष्णदास को वश में करने का प्रयत्न किया, किंतु यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें हानि पहुँचने से बचा लिया, परंतु जब वे जगन्नाथ पुरी लौटे तो उन्होंने हुकुम दिया कि कृष्णदास उनसे अलग रहें, क्योंकि प्रभु कभी भी किसी ऐसी संगति को पसंद नहीं करते थे जो स्त्री से आकर्षित होती हो। इस प्रकार कृष्णदास, भगवान चैतन्य महाप्रभु के व्यक्तिगत सान्निध्य से वंचित हो गए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥