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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.10.14 
पुण्डरीक विद्यानिधि - बड़ - शाखा जानि ।
याँर नाम लञा प्रभु कान्दिला आपनि ॥14॥
 
 
अनुवाद
तीसरी बड़ी शाखा, पुण्डरीक विद्यानिधि, भगवान चैतन्य महाप्रभु को इतनी प्रिय थी कि उनकी अनुपस्थिति में स्वयं भगवान चैतन्य कभी-कभी रो पड़ते थे।
 
The third major branch was Pundarik Vidyanidhi, who was so dear to Sri Chaitanya Mahaprabhu that sometimes Mahaprabhu himself would cry in his absence.
तात्पर्य
गौरा-गणोद्देश-दीपिका (५४) में, श्रील पुण्डरीक विद्यानिधि को कृष्ण-लीला में श्रीमती राधारानी के पिता के रूप में वर्णित किया गया है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें अपने पिता के रूप में माना। पुण्डरीक विद्यानिधि के पिता को बाणेश्वर या, एक अन्य मत के अनुसार, शुक्लांबर ब्रह्मचारी के नाम से जाना जाता था, और उनकी माता का नाम गंगादेवी था। एक मत के अनुसार, बाणेश्वर श्री शिवराम गंगोपाध्याय के वंशज थे। पुण्डरीक विद्यानिधि का मूल घर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में, ढाका के पास एक गांव में था जिसका नाम बाघिया था, जो ब्राह्मण परिवारों के वरेन्द्र समूह से संबंधित था। कभी-कभी ये वरेन्द्र ब्राह्मण राढ़ीय ब्राह्मणों के नाम से जाने जाने वाले एक अन्य समूह के साथ मतभेद रखते थे, और इसलिए पुण्डरीक विद्यानिधि के परिवार को बहिष्कृत कर दिया गया था और उस समय एक सम्मानित परिवार के रूप में नहीं रह रहा था।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में लिखा है, "इस परिवार का एक सदस्य वृंदावन में रह रहा है और उसका नाम सरोजानंद गोस्वामी है। इस परिवार की एक विशेष विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक सदस्य का केवल एक पुत्र था या बिल्कुल भी पुत्र नहीं था, और इसलिए परिवार बहुत विस्तृत नहीं था। पूर्वी बंगाल के चटगाँव जिले में एक जगह है जिसे हाट-हाजारी के रूप में जाना जाता है, और इस जगह से थोड़ी दूरी पर एक गाँव है जिसे मेखला-ग्राम के नाम से जाना जाता है, जिसमें पुण्डरीक विद्यानिधि के पूर्वज रहते थे। मेखला-ग्राम तक चटगाँव से घोड़े पर, बैलगाड़ी या स्टीमर से पहुँचा जा सकता है। स्टीमर स्टेशन को अन्नपूर्णा-घाट के नाम से जाना जाता है। पुण्डरीक विद्यानिधि का जन्मस्थान अन्नपूर्णा-घाट से लगभग दो मील दक्षिण पश्चिम में है। पुण्डरीक विद्यानिधि द्वारा वहाँ बनाया गया मंदिर अब बहुत पुराना हो गया है और इसमें मरम्मत की बहुत आवश्यकता है। मरम्मत के बिना, मंदिर जल्द ही ढह सकता है। उस मंदिर की ईंटों पर दो शिलालेख हैं, लेकिन वे इतने पुराने हैं कि उन्हें पढ़ा नहीं जा सकता। हालाँकि, इस मंदिर से लगभग दो सौ गज दक्षिण में एक और मंदिर है, और कुछ लोगों का कहना है कि यह पुण्डरीक विद्यानिधि द्वारा बनाया गया पुराना मंदिर है।"

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुण्डरीक विद्यानिधि को "पिता" कहा, और उन्होंने उन्हें प्रेमनिधि की उपाधि दी। बाद में पुण्डरीक विद्यानिधि गदाधर पंडित के आध्यात्मिक गुरु और स्वरूप दामोदर के घनिष्ठ मित्र बन गए। गदाधर पंडित ने पहले पुण्डरीक विद्यानिधि को एक साधारण धन-धान्य वाले व्यक्ति के रूप में समझा, लेकिन बाद में, श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सुधार किए जाने पर, वे उनके शिष्य बन गए। पुण्डरीक विद्यानिधि के जीवन की एक और घटना में जगन्नाथ मंदिर के पुजारी की आलोचना करना शामिल है, जिसके लिए जगन्नाथ प्रभु ने उनके गालों पर थप्पड़ मारकर व्यक्तिगत रूप से उन्हें दंडित किया। इसका वर्णन श्री चैतन्य-भागवत, अंत्य-खंड, अध्याय दस में किया गया है। श्री भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर हमें सूचित करते हैं कि उनके समय में अभी भी पुण्डरीक विद्यानिधि के परिवार के दो जीवित वंशज थे, जिनके नाम श्री हरकुमार स्मृतितीर्थ और श्री कृष्णकिंकर विद्यालंकार थे। अधिक जानकारी के लिए वैष्णव-मंजूषा नामक शब्दकोश का उल्लेख करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)