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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  1.10.138 
ईश्वर - पुरीर शिष्य - ब्रह्मचारी काशीश्वर ।
श्री गोविन्द नाम ताँर प्रिय अनुचर ॥138॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मचारी काशीश्वर ईश्वर पुरी के शिष्य थे, और श्री गोविंदा उनके प्रिय शिष्यों में से एक थे।
 
Brahmachari Kashiswara was a disciple of Ishwar Puri and another of his favourite disciples was Shri Govind.
तात्पर्य
गोविंद श्री चैतन्य महाप्रभु के निजी सेवक थे। गौर-गणोद्देश-दीपिका (137) में यह कहा गया है कि पहले वृंदावन में भृंगार और भंगुर नाम के सेवक चैतन्य महाप्रभु के विलासों में काशीश्वर और गोविंद बने। गोविंद हमेशा भगवान की सेवा में लगे रहते थे, यहाँ तक कि बड़े जोखिम में भी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)