श्री चैतन्य महाप्रभु चंद्रशेखर के घर में अद्वैत प्रभु, श्रीवास ठाकुर और अन्य भक्तों के साथ नाटक करते थे। वह स्थान जहाँ चंद्रशेखर का घर स्थित था, अब वृजपत्तन के नाम से जाना जाता है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने इस स्थान पर श्री चैतन्य मठ की स्थापना की। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने जीवन के त्यागपूर्वक क्रम को स्वीकार करने का निश्चय किया, तो श्री नित्यानंद प्रभु ने चंद्रशेखर आचार्य को इसकी सूचना दी, और इसलिए वे तब उपस्थित थे जब भगवान चैतन्य ने कटवा में केशव भारती से संन्यास स्वीकार किया था। उन्होंने ही सबसे पहले नवद्वीप में भगवान चैतन्य के संन्यास स्वीकार करने की बात फैलाई थी। श्री चंद्रशेखर आचार्य भगवान चैतन्य महाप्रभु के लीलाओं में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के दौरान उपस्थित थे। इसलिए वह भगवान चैतन्य के वृक्ष की दूसरी शाखा बनाते हैं।
