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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.10.13 
आचार्यरलेर नाम ‘श्री - चन्द्रशेखर’ - ।
याँर घरे देवी - भावे नाचिला ईश्वर ॥13॥
 
 
अनुवाद
आचार्यरत्न का नाम श्री चन्द्रशेखर आचार्य भी था। उनके घर में एक नाटक में भगवान चैतन्य ने भाग्य की देवी की भूमिका निभाई थी।
 
Acharyaratna was also known as Sri Chandrashekhar Acharya. Chaitanya Mahaprabhu played the role of Lakshmi in a play at his house.
तात्पर्य
नाटक प्रदर्शन श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में आयोजित किए जाते थे, लेकिन ऐसे नाटकों में भाग लेने वाले सभी कलाकार शुद्ध भक्त होते थे। बाहरी लोगों को अनुमति नहीं होती थी। ISKCON के सदस्यों को इस उदाहरण का पालन करना चाहिए। जब भी वे श्री चैतन्य महाप्रभु या भगवान कृष्ण के जीवन पर नाटकीय प्रदर्शन का मंचन करते हैं, तो कलाकारों को शुद्ध भक्त होना चाहिए। पेशेवर खिलाड़ियों और नाटकीय अभिनेताओं को भक्ति सेवा का कोई ज्ञान नहीं होता है, और इसलिए यद्यपि वे बहुत कलात्मक रूप से प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन ऐसे प्रदर्शनों में कोई जान नहीं होती है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ऐसे अभिनेता को यात्रा-डेल नारद के रूप में संदर्भित करते थे, जिसका अर्थ है "हास्यपूर्ण नारद।" कभी-कभी एक नाटक में एक अभिनेता नारद मुनि की भूमिका निभाता है, हालांकि अपने निजी जीवन में वह बिल्कुल नारद मुनि जैसा नहीं होता क्योंकि वह भक्त नहीं होता है। श्री चैतन्य महाप्रभु और भगवान कृष्ण के जीवन के बारे में नाटकीय प्रदर्शनों में ऐसे अभिनेताओं की आवश्यकता नहीं है।

श्री चैतन्य महाप्रभु चंद्रशेखर के घर में अद्वैत प्रभु, श्रीवास ठाकुर और अन्य भक्तों के साथ नाटक करते थे। वह स्थान जहाँ चंद्रशेखर का घर स्थित था, अब वृजपत्तन के नाम से जाना जाता है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने इस स्थान पर श्री चैतन्य मठ की स्थापना की। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने जीवन के त्यागपूर्वक क्रम को स्वीकार करने का निश्चय किया, तो श्री नित्यानंद प्रभु ने चंद्रशेखर आचार्य को इसकी सूचना दी, और इसलिए वे तब उपस्थित थे जब भगवान चैतन्य ने कटवा में केशव भारती से संन्यास स्वीकार किया था। उन्होंने ही सबसे पहले नवद्वीप में भगवान चैतन्य के संन्यास स्वीकार करने की बात फैलाई थी। श्री चंद्रशेखर आचार्य भगवान चैतन्य महाप्रभु के लीलाओं में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के दौरान उपस्थित थे। इसलिए वह भगवान चैतन्य के वृक्ष की दूसरी शाखा बनाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)