श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  1.10.127 
इत्यादिक पूर्व - सङ्गी बड़ भक्त - गण ।
नीलाचले र हि’ करे प्रभुर सेवन ॥127॥
 
 
अनुवाद
ये सभी भक्त प्रारम्भ से ही भगवान के सहयोगी थे और जब भगवान जगन्नाथ पुरी में रहने लगे तो वे उनकी निष्ठापूर्वक सेवा करने के लिए वहीं रह गये।
 
All these devotees were Mahaprabhu's associates from the beginning and when Chaitanya Mahaprabhu started living in Jagannath Puri, they stayed there to serve him faithfully.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)