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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 124-126
 
 
श्लोक  1.10.124-126 
नीलाचले प्रभु - सङ्गे ग्रत भक्त - गण ।
सबार अध्यक्ष प्रभुर मर्म दुइ - जन ॥124॥
परमानन्द - पुरी, आर स्वरूप - दामोदर ।
गदाधर, जगदानन्द, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥125॥
दामोदर पण्डित, ठाकुर हरिदास ।
रघुनाथ वैद्य, आर रघुनाथ - दास ॥126॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथ पुरी में भगवान के साथ आए भक्तों में से दो - परमानंद पुरी और स्वरूप दामोदर - भगवान के हृदय और आत्मा थे। अन्य भक्तों में गदाधर, जगदानंद, शंकर, वक्रेश्वर, दामोदर पंडित, ठाकुर हरिदास, रघुनाथ वैद्य और रघुनाथ दास शामिल थे।
 
Among the devotees who lived with Mahaprabhu in Jagannath Puri, two—Parmananda Puri and Swarup Damodara—were like Mahaprabhu's heart and soul. Other notable devotees include Gadadhara, Jagadananda, Shankara, Vakresvara, Damodara Pandit, Thakur Haridas, Raghunath Vaidya, and Raghunath Das.
तात्पर्य
चैतन्य-भागवत, अन्त्य-खंड, अध्याय पांच में कहा गया है कि रघुनाथ वैद्य, श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने आए थे, जब प्रभु पाणिहाटी में रह रहे थे। वह एक महान भक्त थे और उनमें सभी अच्छे गुण थे। चैतन्य-भागवत के अनुसार, वह पहले बलराम की पत्नी, रेवती थे। जिस पर वह झलक डालते, वह तुरंत कृष्ण चेतना प्राप्त कर लेता था। वह जगन्नाथ पुरी के समुद्र के किनारे रहते थे और उन्होंने 'स्थान-निर्धारण' नामक एक पुस्तक का संकलन किया था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)