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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  1.10.120 
महा - कृपा - पात्र प्रभुर जगाइ, माधाइ ।
‘पतित - पावन’ नामेर साक्षी दुइ भाइ ॥120॥
 
 
अनुवाद
जगाई और माधाई, वृक्ष की अस्सी-नौवीं और नब्बेवीं शाखाएँ, भगवान चैतन्य की कृपा के सबसे बड़े पात्र थे। ये दोनों भाई ही वे साक्षी थे जिन्होंने सिद्ध किया कि भगवान चैतन्य को पतित-पावन, अर्थात् "पतित आत्माओं का उद्धारक" नाम दिया गया था।
 
The eighty-ninth and ninety-ninth branches of the tree, Jagai and Madhai, were the most favored by Sri Chaitanya Mahaprabhu. These two brothers were witnesses, proving that Mahaprabhu's name, Patitapavan, "Savior of the fallen," was meaningful.
तात्पर्य
गौरा-गणोद्देश-दीपिका (115) में यह कहा गया है कि दो भाई जगई और माधई पहले जय और विजय नामक द्वारपाल थे, जो बाद में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बने। जगई और माधई सम्मानित ब्राह्मण परिवारों में पैदा हुए थे, लेकिन उन्होंने चोरों और बदमाशों के पेशे को अपनाया और इस प्रकार सभी प्रकार की अवांछनीय गतिविधियों में फंस गए, विशेषकर नारी-शिकार, नशा और जुआ। बाद में, भगवान चैतन्य महाप्रभु और श्री नित्यानंद प्रभु की कृपा से, उन्हें दीक्षित किया गया, और उन्हें हरे कृष्ण महा-मंत्र का जाप करने का मौका मिला। जप के परिणामस्वरूप, दोनों भाई भगवान चैतन्य महाप्रभु के उच्चकोटि के भक्त बन गए। माधई के वंशज अभी भी मौजूद हैं और वे सम्मानित ब्राह्मण हैं। इन दो भाइयों, जगई और माधई की कब्रें घोषहाटा या माधैतला-ग्राम नामक स्थान पर हैं, जो कटवा से लगभग एक मील दक्षिण में स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि श्री गोपीचरण दास बाबाजी ने लगभग ढाई सौ साल पहले इस स्थान पर नितई-गौर का एक मंदिर स्थापित किया था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)