पुरुषोत्तम, श्री - गालीम, जगन्नाथ - दास ।
श्री चन्द्रशेखर वैद्य, द्विज हरिदास ॥112॥
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अनुवाद
मूल वृक्ष की अड़सठवीं शाखा पुरुषोत्तम थे, उनसठवीं श्री गालीम थे, सत्तरवीं जगन्नाथदास थे, इक्यावनवीं श्री चन्द्रशेखर वैद्य थे, और बहत्तरवीं द्विज हरिदास थे।
The sixty-eighth branch of the original tree was Shri Purushottam, Shri Gaalim was the sixty-ninth, Jagannath Das was the seventy-ninth, Shri Chandarshekhar Vaidya was the seventy-first and Dwij Haridas was the seventy-second branch.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में लिखा है, "इसमें कुछ संदेह है कि क्या द्विज हरिदास अष्टोत्तर-शत-नाम के लेखक थे। उनके दो पुत्र थे, जिनके नाम श्रीदाम और गोकुलानंद थे, जो श्री अद्वैत आचार्य के शिष्य थे। उनका गांव, कांचना-गड़िया, मुर्शिदाबाद [पश्चिम बंगाल में] जिले में अजीमगंज से पांचवें स्टेशन बाज़ारसौ स्टेशन से पांच मील दूर स्थित है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥