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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.10.11 
चारि भाइ सवंशे करे चैतन्येर सेवा ।
गौरचन्द्र विना नाहि जाने देवी - देवा ॥11॥
 
 
अनुवाद
ये चारों भाई और उनके परिवार के सदस्य भगवान चैतन्य की सेवा में पूरी तरह से लगे हुए थे। वे किसी अन्य देवी-देवता को नहीं जानते थे।
 
These four brothers and their family members were completely devoted to the service of Sri Chaitanya Mahaprabhu. They knew no other gods or goddesses.
तात्पर्य
श्रील नरोट्टम दास ठाकुर ने कहा है - "अन्य-देवाश्रय नाई, तोमारे कहिनु भाई, एइ भक्ति परम-कारण: " यदि कोई शुद्ध, कट्टर भक्त बनना चाहता है तो उसे किसी भी देवी-देवता की शरण नहीं लेनी चाहिए। मूर्ख मायावादी कहते हैं कि देवी-देवताओं की पूजा करना परमेश्वर की पूजा करने के समान ही है, परंतु यह एक तथ्य नहीं है। यह दर्शन लोगों को नास्तिकता की ओर भटकाता है। जिस व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि ईश्वर वास्तव में क्या है, वह सोचता है कि वह जो भी रूप कल्पना करता है या जो भी बदमाश वह स्वीकार करता है, वह ईश्वर हो सकता है। सस्ते देवताओं या ईश्वर के अवतारों की यह स्वीकृति वास्तव में नास्तिकता है। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जो लोग देवी-देवताओं या ईश्वर के स्वयंभू अवतारों की पूजा करते हैं, वे सभी नास्तिक हैं। उन्होंने अपना ज्ञान खो दिया है, जैसा कि भगवद्-गीता (7.20) में पुष्टि की गई है - "कामैस्तैस्तैर्हृता-ज्ञान: प्रपद्यंतेऽन्य-देवता: "। " जिनके मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो जाते हैं, वे देवी-देवताओं के चंगुल में फंस जाते हैं।" दुर्भाग्य से, जो लोग कृष्ण चेतना नहीं पैदा करते हैं और वैदिक ज्ञान को ठीक से नहीं समझते हैं, वे किसी भी बदमाश को भगवान का अवतार स्वीकार करते हैं, और वे इस राय के हैं कि कोई महज देवता की पूजा करके अवतार बन सकता है। यह दार्शनिक खिचड़ी "हिंदू धर्म" के नाम से प्रचलित है, परंतु कृष्ण चेतना आंदोलन इसे स्वीकार नहीं करता है। वास्तव में, हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं। देवी-देवताओं और ईश्वर के तथाकथित अवतारों की ऐसी उपासना को कभी भी शुद्ध कृष्ण चेतना आंदोलन के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)