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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  1.10.103 
ताँहार साधन - रीति शुनिते चमत्कार ।
सेइ रूप - रघुनाथ प्रभु ये आमार ॥103॥
 
 
अनुवाद
जब मैं उनके द्वारा की गई भक्ति के बारे में सुनता हूँ तो मुझे आश्चर्य होता है। मैं श्रील रूप गोस्वामी और रघुनाथ दास गोस्वामी को अपना मार्गदर्शक मानता हूँ।
 
When I hear about the devotion they have demonstrated, I am amazed. I accept Srila Rupa Goswami and Raghunatha Dasa Goswami as my guides.
तात्पर्य
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने रघुनाथ दास गोस्वामी को अपना विशेष गुरु माना। इसलिए हर अध्याय के अंत में कहते हैं, श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यारा आशा चैतन्य-चरितामृत कहें कृष्णदास। कभी-कभी गलतफहमी हो जाती है कि रघुनाथ शब्द का प्रयोग करके वे रघुनाथ भट्ट गोस्वामी को अपनी श्रद्धालु आज्ञाकारिता अर्पित करना चाहते थे क्योंकि कभी यह कहा जाता है कि रघुनाथ भट्ट गोस्वामी उनके दीक्षा गुरु थे। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी इस कथन को स्वीकार नहीं करते हैं; वे रघुनाथ भट्ट गोस्वामी को श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी का गुरु नहीं मानते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)