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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 9: अद्वैत आचार्य की महिमा
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श्लोक 257
श्लोक
3.9.257
ভক্তির ভাণ্ডারীশ্রী-অদ্বৈত মহাশয
অদ্বৈতের কৃপায সে কৃষ্ণ-ভক্তি হয”
भक्तिर भाण्डारीश्री-अद्वैत महाशय
अद्वैतेर कृपाय से कृष्ण-भक्ति हय”
अनुवाद
"श्री अद्वैत प्रभु भक्ति के भण्डार के अधिष्ठाता हैं। भक्ति उनकी कृपा से ही प्राप्त होती है।"
"Shri Advaita Prabhu is the presiding deity of the storehouse of devotion. Devotion is attained only by his grace."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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