श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 9: अद्वैत आचार्य की महिमा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.9.17 
শুনিঞা প্রভুর ভক্ত-বত্সলতা-বাণীকি
আনন্দে অদ্বৈত ভাসেন নাহি জানি
शुनिञा प्रभुर भक्त-वत्सलता-वाणीकि
आनन्दे अद्वैत भासेन नाहि जानि
 
 
अनुवाद
भगवान के ऐसे स्नेहपूर्ण वचन सुनकर अद्वैत को जो आनंद हुआ होगा, उसे कौन समझ सकता है?
 
Who can understand the joy that Advaita must have felt after hearing such affectionate words from the Lord?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)