श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 9: अद्वैत आचार्य की महिमा  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  3.9.122 
সে জনের নাম আমি বলি ’লক্ষেশ্বর’
তথা ভিক্ষা আমার, না যাই অন্য ঘর”
से जनेर नाम आमि बलि ’लक्षेश्वर’
तथा भिक्षा आमार, ना याइ अन्य घर”
 
 
अनुवाद
"मैं ऐसे व्यक्ति को लक्षेश्वर कहता हूँ। मैं केवल ऐसे ही व्यक्ति के घर भोजन करता हूँ, दूसरों के घर नहीं।"
 
"I call such a person Laksheshwar. I eat only at such a person's house, not at anyone else's."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)