ये यथा मां प्रपद्यन्ते
तांस्तथैव भजाम्य अहम्
"जैसे-जैसे सभी मेरे शरण में आते हैं, वैसे-ही वैसे मैं उन्हें फल देता हूँ।" [भगवद्गीता 4.11] इस श्लोक के तात्पर्य के अनुसार, सभी प्रकार के भक्तों को स्वयं की रुचि के अनुसार भगवान की सेवा करने का अवसर प्राप्त होता था।
