शास्त्रानुसार, एक संन्यासी को कस्तूरी, चंदन व पान जैसे ऐश्वर्य के पदार्थों का सेवन करना मना है। लेकिन प्रकृत सहजिया मत के नये-नये घमंडी लोग अत्यंत पान के सेवन को प्रसाद ग्रहण का बहाना बनाकर करते हैं। चूंकि, ऐसे अनधिकारी लोगों द्वारा परमहंस का स्वांग हमेशा घृणित है। इसलिए साधारण मूढ़ लोग परमहंस तत्व के मूल आधार श्री नित्यानंद को भी विविक्त (रूखा त्यागी) या धीर-संन्यासी (नया संन्यासी) मानकर भ्रमित हो गये।
