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श्लोक 3.5.735  |
যদুনাথ কবিচন্দ্র—প্রেম-রস-ময
নিরবধি নিত্যানন্দ যাঙ্হারে সদয |
यदुनाथ कविचन्द्र—प्रेम-रस-मय
निरवधि नित्यानन्द याङ्हारे सदय |
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| अनुवाद |
| यदुनाथ कविचन्द्र परमानंद प्रेम की मधुरता से परिपूर्ण थे। नित्यानंद उन पर सदैव कृपालु रहते थे। |
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| Yadunath Kavichandra was filled with the sweetness of ecstatic love. Nityananda was always kind to him. |
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