श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 680
 
 
श्लोक  3.5.680 
যেন মোর চিত্ত হৈল তোমার হিṁসায
সেই মোর প্রাযশ্চিত্ত—মরিমু গঙ্গায”
येन मोर चित्त हैल तोमार हिꣳसाय
सेइ मोर प्रायश्चित्त—मरिमु गङ्गाय”
 
 
अनुवाद
“चूँकि मैंने आपको नुकसान पहुँचाने का इरादा किया था, इसलिए मेरा प्रायश्चित यही होना चाहिए कि मैं गंगा में डूब जाऊँ।”
 
“Since I intended to harm you, my atonement should be to drown myself in the Ganges.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)