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श्लोक 3.5.645  |
হুঙ্কার গর্জন নিরবধি করে প্রেমে
বাহ্য নাহি জানে বিপ্র করযে ক্রন্দনে |
हुङ्कार गर्जन निरवधि करे प्रेमे
बाह्य नाहि जाने विप्र करये क्रन्दने |
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| अनुवाद |
| वह निरंतर प्रेमोन्मत्त होकर गर्जना और गरजने लगा। रोते-रोते उस ब्राह्मण की सारी बाह्य चेतना नष्ट हो गई। |
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| He roared and roared in a constant ecstasy of love. The Brahmin lost all his external consciousness as he wept. |
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