श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 645
 
 
श्लोक  3.5.645 
হুঙ্কার গর্জন নিরবধি করে প্রেমে
বাহ্য নাহি জানে বিপ্র করযে ক্রন্দনে
हुङ्कार गर्जन निरवधि करे प्रेमे
बाह्य नाहि जाने विप्र करये क्रन्दने
 
 
अनुवाद
वह निरंतर प्रेमोन्मत्त होकर गर्जना और गरजने लगा। रोते-रोते उस ब्राह्मण की सारी बाह्य चेतना नष्ट हो गई।
 
He roared and roared in a constant ecstasy of love. The Brahmin lost all his external consciousness as he wept.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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