|
| |
| |
श्लोक 3.5.418-419  |
ব্রহ্মাদির অভীষ্ট যে সব কৃষ্ণ-ভাব
গোপী-গণে ব্যক্ত যে সকল অনুরাগ
ইঙ্গিতে সে সব ভাব নিত্যানন্দ-রায
দিলেন সকল প্রিয-গণেরে কৃপায |
ब्रह्मादिर अभीष्ट ये सब कृष्ण-भाव
गोपी-गणे व्यक्त ये सकल अनुराग
इङ्गिते से सब भाव नित्यानन्द-राय
दिलेन सकल प्रिय-गणेरे कृपाय |
| |
| |
| अनुवाद |
| अपनी अहैतुकी कृपा से भगवान नित्यानन्द ने अपने प्रिय पार्षदों को मुक्त हस्त से कृष्ण के प्रति वह प्रेम वितरित किया जो ब्रह्मा जैसे व्यक्तियों द्वारा वांछित होता है तथा गोपियों द्वारा प्रदर्शित कृष्ण के प्रति आसक्ति। |
| |
| By His causeless mercy, Lord Nityananda freely distributed to His beloved associates the love for Krishna desired by persons like Brahma and the attachment for Krishna displayed by the gopis. |
|
|
| ✨ ai-generated |
| |
|