श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  3.5.276 
স্বানুভাবানন্দে প্রভু নিত্যানন্দ-রায
প্রেম-দৃষ্টি-বৃষ্টি করি’ চারি দিকে চায
स्वानुभावानन्दे प्रभु नित्यानन्द-राय
प्रेम-दृष्टि-वृष्टि करि’ चारि दिके चाय
 
 
अनुवाद
भगवान नित्यानंद प्रभु ने अपने आनंदमय भाव में चारों दिशाओं में अपनी कृपा दृष्टि से सभी को आनंदमय प्रेम से भर दिया।
 
Lord Nityananda Prabhu in His blissful mood filled everyone with blissful love by His gracious glance in all four directions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)