श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.4.88 
অন্য-জন-সহিত কথার কোন্ দায?
নিজ-পারিষদেই সম্ভাষা নাহি পায
अन्य-जन-सहित कथार कोन् दाय?
निज-पारिषदेइ सम्भाषा नाहि पाय
 
 
अनुवाद
दूसरों से बातचीत की तो बात ही क्या, भगवान् अपने ही साथियों से भी बातचीत नहीं करते थे।
 
Forget about talking to others, God did not even talk to his own companions.
तात्पर्य
महाप्रभु के अनेक निकटस्थों को उनसे संवाद करने का अवसर नहीं मिलता था । श्री गौरसुंदर दिन-रात स्वयं कीर्तन करने और दूसरों को कीर्तन करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे । अत: बाहर के लोगों को उन्‍हें सलाह देने का अवसर नहीं मिलता था ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)