श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 515
 
 
श्लोक  3.4.515 
অদ্বৈতের যে আনন্দ—অন্ত নাহি তার
আপনে বৈকুণ্ঠ-নাথ গৃহ-মধ্যে যাঙ্র
अद्वैतेर ये आनन्द—अन्त नाहि तार
आपने वैकुण्ठ-नाथ गृह-मध्ये याङ्र
 
 
अनुवाद
अद्वैत के आनन्द का कोई अंत नहीं था, क्योंकि वैकुण्ठ के भगवान स्वयं उनके घर में उपस्थित थे।
 
There was no end to Advaita's joy, as the Lord of Vaikuntha himself was present in his house.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)